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इस दीवार में मत कोई दाग देखिये

Two ‘E’s of a country’s status

In new India the ten most important indians are the education ministers of ten largest states. The next ten most important ones are secretaries to these ministers.

In today’s global economy a country’s status is determined by the share of brands that it commands and the share of brains that it uses. Our plight as a nation in failing on both these fronts has a dichotomy. In two E’s. Economy and Education. 

Economic reforms that we tried to bring upon had an effective yet a limited role. For example, when government liberated internet from the monopoly of VSNL, it liberated millions of young minds and thus harnessed million of young brains. Soon India saw a gigantic rise of Infosys and many other Indian enterprises followed the suite. Today in IT sector India has a long standing. With recent telecom revolution in terms of internet data and it’s increasing utility, in governance in general and in welfare schemes in particular; we are on verge of something really incredible. It all had started with freeing internet from govt control.
Similarly, if we would open the trade in agriculture, it would harness million of farmhands. But the problem is that many vested interests misguide mass on such reforms of vital nature. Reforms like any other change bring initially pain. Vested interests often use this pain to blur the vision of people to see the fruits which lie ahead. They could do so because of our unforgiving failure in building a just and equitable education system in last 70 years. Only an un-informed one can be misguided. And the most powerful way to make people well informed about things is through education.
Recently in his ‘man ki baat’ PM has said that in new india no one is VIP but everyone is EPI (Every Person is Important).

With full understanding of the nobler values with PM has said this, I beg to differ. In new india everyone is not important equally. The ten most important indians are the education ministers of ten largest states. The next ten most important ones are secretaries to these ministers. Unfortunately they do not realise their historic mission. Mr PM, our drive for ending VIP culture in our political and bureaucratic circle is all well intentioned, but for God sake more important is to wake them to the fact that they have a massive mission on their shoulders and they must have to accomplish it. for this they off course can feel themselves a little important ones (though now without red beacons ;-))


– Abhinav Shankar

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक पाती

आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता। इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये।

प्रिय अरविन्द केजरीवाल जी,
नमस्कार !!

पिछले कुछ १०-२० दिनों से आपको पत्र लिखने के लिए सोच रहा था. पर एक आम आदमी कि परेशानियां तो आप जानते ही हैं. घर-ऑफिस कि जिम्मेदारियों के बीच समय निकालते निकालते इतने दिन निकल गए. इस देरी का हालांकि फायदा ये हुआ है कि इस बीच आप दिल्ली के मुख्य-मंत्री हो गए हैं तो आपसे कहने, बतियाने के लिए मेरे पास भी एक-दो बातें ज्यादा हो गयी हैं.

पिछले कुछ समय से, अन्ना जी के आंदोलन के समय से ही मेरे आस पास का माहौल बदला है, इतने सारे संयोगो-प्रयोगो को होते देखा है कि ऐसे तो मैं आपसे कई बातें कहना चाहता हूँ, बताना चाहता हूँ. पर बातचीत शुरू करने के लिए जो सबसे पहला मुद्दा एक आम आदमी कि समझ से लगता है कि वो आपकी सेहत का है. एक आम आदमी के लिए उसका शरीर ही सबकुछ होता है. और इस बात पर आपने मुझे बहुत निराश किया है. करीबन आज १५ दिन हो गए होंगे आपकी खांसी के. मुझे नहीं पता कि आप किससे अपना इलाज़ करवा रहे हैं. पर इतना जरुर पता है कि आपका इलाज़ अच्छे से नहीं हो पा रहा है. इतने साल दिल्ली में रहने के बाद इतना दावे से कह सकता हूँ कि आम खांसी सही इलाज़ से दिल्ली के ठण्ड के बीच भी मुश्किल से ५ दिन में निपट जाती है. यदि ऐसा नहीं होता तो या तो खांसी आम नहीं है या डॉक्टर सही नहीं है. इसलिए मुझे उम्मीद है कि आप अपने सेहत को गम्भीरता से लेंगे और दोनों ही सम्भावनाओं कि उचित पड़ताल करेंगे। अपनी आम समझ से एक और बात जो मैं आपसे कहना चाहता हु वो ये है कि राजनीति में आम आदमी भले काम कि चीज़ हो पर सेहत के मामलात में डॉक्टर खास (Specialist) ही काम के होते हैं, आम नहीं। तो इसलिए यहाँ अपने सिद्धांतों को थोडा परे रखियेगा। आपकी सेहत हमारे लिए महत्व्पूर्ण है.

आगे बढ़ते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि शपथ लेने जाते हुए आप नीले स्वेटर में बहुत जँच रहे थे. और जिस सादगी से आपने भव्यता के प्रतीक समझे जाने वाले पलो को अपने जीवन में स्वीकार किया वो एक मिसाल है. अखबारों में जो ख़बरें आयी हैं उसके मुताबिक आपने अपने लिए घर भी बेहद सादगी वाला ढूंढने का निर्देश दिया है. उसी खबर के मुताबिक़ पूरा PWD विभाग पिछले कई घंटो से इसमें लगा है जो उनके लिए काफी मुश्किल भरी कवायद भी साबित हो रही है. यहाँ मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ. आपके सादगी में इस विश्वास को मेरा नमन. पर मैं यकीं के साथ ये कहना चाहता हूँ कि एक आम आदमी का जेब छोटा हो सकता है लेकिन दिल इतना छोटा नहीं कि अपने मुख्य-मंत्री को एक चारदीवारी वाला मकान मिलने पर तंज़ करे. आप इस आशंका को पूरी तरह अपने दिल से निकाल दे. मैं ये बातें आपको इसलिए लिख रहा हूँ क्यूंकि उसी अखबार में एक खबर ये भी छपी थी कि पूर्वी दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों के इलाके में छतें गिर गयी हैं और आबादी का एक बड़ा हिस्सा भरी ठण्ड में भी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है. PWD विभाग मुख्य-मंत्री के लिए एक सादे घर के इंतज़ाम में मशगूल रहने के कारण यदि इनकी सुध नहीं ले पाया तो ये उतना ही निर्मम होगा जितना मुख्य-मंत्री के लिए एक आलिशान बंगला ढूंढने में लगे रहने में सुध न ले पाने के कारण होता। ये तो एक तात्कालिक कारण है. एक बड़ा कारण ऐसा कहने का ये है कि मैंने उसी दिन एक और खबर पढ़ी थी. ये खबर उन मुख्य-मंत्रियों के बारे में थी जिन्होंने ऐसी ही कम-ज्यादा सादगी दिखायी थी. जैसे बंगाल के मुख्य-मंत्री, त्रिपुरा के मुख्य-मंत्री, ओड़िसा के मुख्य-मंत्री थे. अब अगर बंगाल- ओड़िसा के आम आदमी कि बात की जाये जो दिल्ली कि सड़को पर अक्सर मिल जायेंगे तो उनसे मिलकर तो दिल्ली के आम आदमी को खुद के खास होने का रश्क होने लगे. आप इशारा समझ रहे होंगे। मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है.

आपने राजनीति में कम समय में ही ऐसे कई अभिनव प्रयोग करके दिखा दिए हैं कि बड़े बड़े महारथीयों के भी होश गम हो गए. इसके लिए साधुवाद। जब आपने कोंग्रेस से गठबंधन के लिए वापस जनता के बीच जाने का, उसकी राय इसपर राय जानने का प्रयोग किया तो यकीं मानिये मेरा दिल फूला नहीं समा रहा था. आप का ही एक भाषण सुना था जब आप मेरे इलाके में चुनाव प्रचार के लिए आये थे. आपने कहा था कि आम आदमी डरा हुआ है. ये बात मैंने उस दिन प्रत्यक्ष महसूस की. आपके उस प्रयोग से दिल तो फुला नहीं समां रहा था पर दिमाग में कुछ डर सा भी लगा. पर चूँकि आम आदमी को खुश होने के मौके बहुत कम मिलते हैं इसलिए उस आशंका को दबा मैं सबों के साथ खुश हो गया. जनता कि राय से सरकार चले, उसकी भागीदारी हो- वाह मुझ जैसे आम आदमी को तो मनो जमीं पर ही जन्नत नसीब हो गयी. पर अब हर काम क्षेत्र कि जनता के राय से, मर्ज़ी से ही होगा; क्षेत्र कि जनता के मर्ज़ी से ही कानून बनेंगे, हटेंगे- ये मैंने आपके पार्टी के कई नेताओं के मुह से और आपके मुँह से भी सुना। इसने मेरी पहले दिन कि आशंका को फिर से सर उठाने का मौका दे दिया। फिर आपके एक विधायक को टीवी पर एक सवाल के जवाब में जम्मू-कश्मीर के भारत या पकिस्तान में रहने के सन्दर्भ में इसी फॉर्मूले को लागु करने की जिद करते देखा। ये सुनने के बाद मुझे वही बात याद आ गयी- किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. ये सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे आपको कुछ बातें जरुर बतानी चाहियें। एक दिल्लीवासी होने के नाते 700 L मुफ्त पानी और बिजली के आधे बिल मेरे लिए जन्नत कि नेमतों से कम नहीं है. पर इन सबके बावजूद इसके लिए जम्मू-कश्मीर कि कीमत थोड़ी ज्यादा लगती है. मैं एक आम आदमी हूँ इसलिए अपनी ताकत के साथ साथ अपनी कमजोरोयों को भी अच्छे से जानता हूँ. मैं आपकी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखता हूँ कि आम आदमी डरा हुआ है. मैं भी डरा हुआ हूँ, अपनी कमजोरियों से. मैं डरा हुआ हूँ कि जम्मू-कश्मीर कि छोड़िये, ऐसे प्रोत्साहन मिलने पर कल को मैं खुद दिल्ली को एक अलग देश बनाने कि मांग का समर्थन कर दूँ. मैं डरा हुआ हूँ कि यदि क्षेत्र कि जनता की मर्ज़ी के हिसाब से ही कानून बनने लगे/ ख़त्म होने लगे तो देश के सबसे खराब लिंग अनुपात वाले पंजाब में वहाँ कि जनता अपने पूर्वाग्रहों के कारण भ्रूण-हत्या-रोकथाम कानून खत्म न कर दे. मैं डरा हुआ हूँ कि Honor Killing के लिए कुख्यात हरयाणा में जनता उसे जायज़ बनाने का कानून न ले आये. ऐसी और कई चीज़ें हैं जिनसे मैं डर जाता हूँ. और मैं डरता हूँ कि आम आदमी को फायदा पहुचने और उसका उत्थान करने वाले पहले भी आये कई कथित क्रांतिकारी विचारों, इन्कलाबों जैसे समाजवाद, समतावाद, मार्क्सवाद कि तरह ये इंकलाब भी अपने कर्णधारों के अतिरेक उत्साह और अकुशलता के कारण बिना किसी ठोस बदलाव को लाये एक चूका हथियार बन कर न रह जाये।

हो सकता है कि मैं नाहक डर रहा होऊं और ऐसा कुछ न हो. लेकिन ये भी हो सकता है कि मेरा डर सही साबित हो. क्यूंकि इस देश के इतिहास ने कई बार ऐसे डर को सही साबित किया है- विनोबा भावे के आंदोलन से लेकर जेपी के आंदोलन तक और शायद अनना के आंदोलन तक भी. एक और बात कहूंगा। अखबारों से ही सुना कि आप लोकसभा का चुनाव भी लड़ने वाले हैं ताकि केंद्र में भी आम आदमी को उसकी सरकार मिल सके. आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन एक दिल्ली-निवासी और एक आम आदमी होने के नाते मैं आपको ये सलाह देने का दुस्साहस करूँगा कि फिलहाल आप दिल्ली पर ही ध्यान दे. आप आम आदमी के सहारे, उसके फैसलो के सहारे सत्ता चलना चाहते हैं. लेकिन आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता। इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये। सदियों कि जड़ता है, इसे ख़त्म होने में सदियाँ तो नहीं लेकिन दशक का वक़्त तो लगेगा ही. इसे वो वक़्त दीजिय। ज्यादा आंच खाने को जल्दी बनाने से ज्यादा उसे खराब कर देती है. पिछले एक साल में हिंदुस्तान के आम आदमी ने सीरिया, मिस्र, अरब के आम आदमी से इतना तो सिखा ही है. मैंने पहले भी लिखा है कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को खत्म कर देता है, चाहे वो उत्साह का अतिरेक हो, फैलाव का या बदलाव का अतिरेक।

ये पत्र जब तक आपको मिले हो सकता है कि नया साल आ जाये। नया सबेरा, नया सूरज, नयी रोशनी। उम्मीद करता हूँ कि ये सूरज अँधेरे में रहने वाले लोगो के लिए नया दिन लेकर आएगा और बदन झुलसा देने वाले दोपहर के अतिरेक से बचा रहेगा।

वंदे मातरम !!
एक आम आदमी
अभिनव

 

P.S.:- This letter from writer to Shri Arvind Kejriwal was written on 30/12/2013 as a facebook post (https://www.facebook.com/abhinav.shankar.50/posts/604996452906849). Being republished in this site for purpose of record only.

Reform the way you bring reforms: A Take

“The greatest disservice to the reform as an economic attitude has not been done by its opponents or distractors, but by those reformers who failed to comprehend it in a language that a voter can understand”

The GST is a burning example how each reform in our country is prolonged in its implementation till it loses its very relevance. The subject, however, is not the GST here. This writing intends to talk about bigger challenges before us regarding reforming the economic attitude of this nation. Like any process, reforms too, are time-bound concepts. If they are not implemented within its right time, there remains very little to gain from them.The GST is not the only example, almost every reform in our country has got more or less same destiny. Even in early 90’s- which is considered as a golden era in terms of reforms, we could not go for a “full-fledged” one. It was only for two & half years that we could go through our course of reforms. Even today many infamous facets of old license system haunt us. Many important reforms could never take place, like labour reforms. So was the “Company Rules”. It is still impossible to shut down a company in India. Our taxation system too, is in no better shape- considered one of the worst in the world. Some even go to call it “Tax-terrorism”. 


Some attempts were done to reform our taxation system from time to time, though they were lacking in compositeness in their approach and nowhere in a match with rest of the world; and so expectedly could not take us much ahead. Leave whole world, even Asian countries like Singapore, Vietnam, South Korea, China, who once were equal (or in fact below) to us in economic and social parameters, proved to be quick and wise enough to identify true significance of the reform and wholeheartedly accepted it and established a type of “synchro” with respect to rest of world. In India we did not only identify the importance of the reform lately, we moved on the road of reforms at much slow pace with great reluctance. Most importantly we failed to reform two sectors of great opportunity: Education & Health.

But it is not the greatest failure of our reformers. Their biggest failure lies in the fact that they could not sell reforms to the public. The greatest disservice to the reform as an economic attitude has not been done by its opponents or distractors, but by those reformers who failed to comprehend it in a language that a voter can understand. Reforms mostly bring their fruit in long term, while in short term, like any transition, they bring the pain. And pain if not explained as a price for a future fruit- is most likely to be resisted by the pain-bearer, common man in this case. And here our reformers missed the bus. Some vested interests catalysed their anger, influenced their understanding and almost blocked the road to reforms. What if a pregnant lady bearing dire pain-who otherwise would bring a new dawn of life to this earth; gets convinced by some old malevolent lady that pain is not worth for ?? This is what happened with reforms in India. Before it could deliver results, in mid of the way it got aborted. Some vested interests with powerful lobby delivered this task quite successfully. In order to understand challenges before us to revive reforms, it is very important to identify these vested interests and their modus operandi. 

Before the introduction of our new economic policy in 1990, we had an economic model where commanding heights of the economy were controlled by the state. This system was such that it favoured non-performers more than performers. Reforms were meant to introduce a new system favourable to performers and fatal to non-performers. It alarmed non-performers in form of govt. employees, trade unions, public sector employees and bureaucrats. The new economic system was to facilitate a model which was uncomfortable to all above of these. But they could not oppose reforms citing these reasons straight. So they dressed up their vested interests with a “human-face” i.e. possibilities of exploit of poor. Some politicians also joined the gang as the new economic model was also meant to reduce their stature from the previous glorious status of controllers to just facilitators!! Apart from ego issues, this new system was also meant to limit their control on the economy- less control means less opportunity to misuse it, less chance of corruption!! So together they decided to block this initiative. 

In their drive to prevent reforms to take place, they attacked it from two sides. Firstly they attacked psychic of innocent mass, who was the prime receiver of the pain of change, these reforms had bought. As cited earlier reformers could not comprehend reforms in a language mass could understand and could get motivated enough to bear that pain, the pain blurred their vision to see the fruits of these reforms waiting ahead. 

This was augmented by misinformation propagated by the nexus of Politicians, Babus and trade unions. Apart from this, they tried to block reforms by sending wrong feedback to top brass about the reaction to their initiative of the reform. They misled their masters and policy-makers at the top. The public was indeed uncomfortable but certainly would tolerate it if would not had been misinformed. An exaggerated version of this discomfort was reported at the top. This cautioned especially political class. A largely fictional narrative of wide public anger against reforms had been perfectly set in New Delhi. This made pro-reform policymakers defensive in their attitude and soon they started to find their initiative for more reforms lesser space in policy draft. The Nexus had succeeded in its plan. Reformers soon got marginalised in policymaking.

Experiences from GST and Gujarat Election suggests that situation has not altered much since then. Vested reforms are still powerful and able to mislead mass by their time-tested strategy of “Double-attack” explained above. It is important to note that collective conscious of mass in India, has always been welcoming the reform, all they need is a little psychic support, clarity about objectives & benefits from it for them, insulation from misinformation and motivation to bear some pain for it !! 

Let us not be in the euphoria that once fruits of reform will get passed to the public they will not come under influence of such propaganda. Reforms are long-term concepts and it takes time to gain from them. Vested interests disturb the “momentum” in between and spoil them mid-way. So every time a reform is introduced, the public must be communicated in clear terms that what betterment it would bring to an “Aam Admi” and what pain it would cost. Let us be sure that once educated about the price and the gain, a common man is wise enough to co-operate with policymakers. Demonetisation has ably demonstrated it.

Abhinav Shankar

zender विमर्श और सेक्स

“सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है”

स्त्री-पुरुष संबंधों पर कोई भी बात सेक्स के विमर्श के बिना नही की जा सकती| क्योंकि सेक्स ही इन दोनों के बीच का अनन्यतम संबंध है। बाकी सभी संबंध इस संबंध के फलन मात्र हैं। विडंबना ये है कि अधिकतर जेंडर संबंधी विमर्श या तो सेक्स को अपने विमर्श में शामिल नही करती या शामिल करती भी है तो सेक्स को लेकर एक balanced या natural stance इस परिपेक्ष्य में सामने नही रख पाती। ज्यादातर प्रबुद्ध विचारको ने भी इस विषय पर एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़े रखी है। एकमात्र ओशो ही हैं जिन्होंने इस बारे में थोड़ा-बहुत बोला। उन्होंने कहा कि सेक्स से बड़ी फ़ोर्स नही है, दुनिया मे जो भी creativity है उसके मूल में सेक्स ही है। वो जीवन की अनिवार्यता है। सारी प्रकृति उस पर खड़ी है, सारा विराट सृजन उस पर खड़ा है। अगर हम इसे निंदित बना देंगे तो सारा मामला ही गड़बड़ा जाएगा। और गड़बड़ा गया है। इसलिए मनुष्य का चित्त रुग्ण से रुग्ण होता जा रहा है। ओशो सही थें कि सेक्स के प्रति निंदात्मक रवैये ने मनुष्य के चित्त को रुग्ण से रुग्णतर कर दिया। लेकिन ओशो भी इतना ही कह कर रुक गए। इससे आगे नही गए। ओशो को इससे आगे जाना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि निर्माण की एक क्रिया निषेध की अधिकारी करार दे दी गयी ?? ऐसा कैसे हुआ कि सृजन का एक यज्ञ मनुज मानस में क्रमशः धिक्कार के वेदी पर बलि चढ़ता गया ?? क्या त्रासदी हुई कि वो मनुष्य जो येन-केन प्रकारेण खुद को रचयिता कहलवा सकने को इतना लालायित रहता है उसने रचना की सबसे मौलिक क्रिया को वर्जना की हद तक छिपाने की कोशिश की ???


संभवत: ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाकी विषयों की तरह सेक्स के doctrine पर भी शुरुवात से patriarchal सोच ने अपना कब्जा जमा लिया। जबकि सेक्स अनिवार्य रूप से एक ‘स्त्री-विषय’ है। हम माने या न माने पुरुष की भूमिका सेक्स में वस्तुतः एक ‘सेवक’ के सदृश है, जहाँ वास्तविक आनंद स्त्री के हिस्से होता है। ये अलग बात है कि पुरुष अहंकार कभी ये बात मानना नही चाहता। 


देखे तो सेक्स मूलतः प्रेम का एक ‘उपकरण’ है। एक साधन। पर इसे लेकर स्त्री और पुरुष के नज़रिए में एक fundamental अंतर है। स्त्री के लिए प्रेम सेक्स का एक inseperable अंग है। वो यहाँ उद्देश्य (प्रेम) और उपकरण(सेक्स) में भेद नही करती। वो सेक्स उसी से कर सकती है जिससे प्रेम करती है। जबकि पुरुष के लिए प्रेम और सेक्स दो अलग अलग चीजें हैं। उसके लिए प्रेम का होना सेक्स की अनिवार्य शर्त नही है। यहाँ वो उपकरण और उद्देश्य में फर्क करता है। वो उससे भी सहज ही सेक्स कर सकता है जिससे प्रेम नही करता। उपकरण को उद्देश्य से अलग कर देख सकने की ये पुरुष-प्रवृति उसे यौनिक रूप से उच्छशृंखल तो बनाती है लेकिन इस ‘उद्देश्यरहित-उपकरण’ की अपूर्णता और उसमें छिपी कपटता का भी उसे कहीं न कहीं बखूबी भान होता है। शायद यहीं से सेक्स के साथ एक किस्म के ‘अपराधबोध’ के भाव के जुड़ने की शुरुवात होती है। चूंकि सेक्स के पूरे doctrine का संचालन पुरुष वर्चस्व वाले समाज के पुरुष-सोच से हुआ, ग्लानि से भरे पुरुष के ‘alter-ego’ ने इस पूरी क्रिया को ही अनैतिक करार दे दिया, एक taboo बना दिया। शनै-शनै सेक्स के प्रति निंदात्मक भाव ने स्त्री और पुरुष दोनों के मानस में समान रूप से अपने को स्थापित कर लिया। जबकि सेक्स मूल रूप से इस दुनिया की सबसे सहज और सबसे मासूम क्रिया है। आज भी मातृसत्तात्मक समाजों में सेक्स उस किस्म का taboo नही है, बल्कि कोई टैबू ही नही है। यही कारण है कि वहाँ यौन अपराध भी न के बराबर हैं। क्योंकि स्त्री-मानसिकता से संचालित हुए सेक्स के doctrine में किसी प्रकार के अपराधबोध का भाव सम्मिलित नही था। और इसी कारण वहाँ वो अपनी स्वाभाविक गति से सहजता और परिपक्वता के साथ evolve हुआ। 


सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है। सेक्स का taboo बन जाना स्त्री-पुरुष संबंधों के evolution की सबसे बड़ी त्रासदी है और patriarchal mentality का सबसे बड़ा दोष !!! इस त्रासदी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये सामने आया कि इसने स्त्री-पुरुष संबंधों को हद से अधिक जटिल कर दिया। बल्कि messy !! इस हद तक कि एक दूसरे को complement करने के लिए बनी दो identities, एक दूसरे को क्रूरता की हद तक compete कर रही हैं। आज feminism के हाहाकारी शोर और पुरुष-वर्चस्व के पाश्विक अट्टहास के बीच पड़ी ये दुनिया इस ऐतिहासिक दुर्घटना की अंतहीन शिकार है। 


– अनिकुल के कलम से

भारतीय मीडिया: निष्पक्षीय, एकपक्षीय या बहुपक्षीय ??

निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है

आज जब मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं तो इन तीन सालों में हुए बदलावों पर स्वाभाविक रूप से पूरे देश मे चर्चाओं का एक दौर चला है। कुछ मोदी सरकार खुद भी इन चर्चाओं को कराने को उत्सुक दिखती है। विपक्ष तो इच्छुक है ही। जाहिर है कई विषयों पर चर्चा होगी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, रणनीतिक। मैं आज इन विषयों पर बात नही करना चाहता। नही करना चाहता इसके कई कारण है। पहला तो ये की मैं अक्सर इन क्षेत्रों में हो रहे बदलावों पर ब्लॉग वगैरह पर लिखता रहा हूँ। दूसरा, आज इन चीजों पर पहले ही टनों स्याही बहाई जा चुकी होगी और तीसरा की आज जिस विषय पर में बात करना चाहता हूं वो आज शर्तिया नही हुई होंगी या हुई भी होंगी तो उस परिपेक्ष्य में नही हुई होंगी जिस परिपेक्ष्य में होनी चाहिए। 


मोदी सरकार में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो मीडिया में आया हैं। रजत शर्माओं, अरनबों, सरदनाओं, सुधीर चौधरियों, गौरव सावन्तो और मारूफ रजाओं का आदुर्भाव भारतीय मीडिया के course of evolution का एक महत्वपूर्ण devlopmemt है। लोकतंत्र में आदर्श स्थिति ये होती है कि मीडिया निष्पक्ष रहता। भारत मे पत्रकारिता लगभग शुरू से वैचारिक स्तर पर एक खास ओर झुकी रही पर पिछले लगभग 12 सालों से जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया ये ‘वैचारिक झुकाव’ शनै शनै ‘दलीय पक्षधरता’ में बदलता चला गया। और जब संघवीयों, बरखाओं, सरदेसाईओं और रविशों जैसे पत्रकारिता के सबसे बड़े नाम एक साथ एक समूह के तौर पर एक पक्ष में जा मिले तो ये स्वाभाविक हो गया था कि एक institution के तौर पर पत्रकारिता में इस ‘पक्ष’-धरता के मुकाबिल एक ‘विपक्ष’ भी उभरे। 


लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं (जिसमे press भी आता है-लोकतंत्र का चौथा स्तंभ) या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नही होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया। मोदी सरकार के इन तीन सालों का ये सबसे बड़ा बदलाव है और एक शुभ बदलाव है। ये स्थिति भले निष्पक्ष मीडिया के utopian अवधारणा जैसी आदर्श नही है पर ‘एकपक्षीय’ मीडिया के त्रासदी से लाखों गुणा बेहतर है। 


बल्कि एक दृष्टि से बहुपक्षीय मीडिया ‘निष्पक्ष मीडिया’ के अवधारणा के काफी पास है। मिसाल के तौर पर- जब पाकिस्तान के संदर्भ में अर्णब आक्रामक तौर-तरीको की पैरवी करते हुए उसके लाभों को गिनाते हैं और बरखा pacifist appeal करते हुए युद्ध की कीमत याद दिलाती हैं; तो भले व्येक्तिक-स्तर पर वो दो विरोधी पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर मीडिया के ‘collective-conscious’ के व्यापक परिदृश्य पर वो सामूहिक तौर पर एक ‘निष्पक्ष तस्वीर’ ही सामने रखते हैं। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा बेहतर है जब इस मामले में बरखा के अकेले show में वो आदतन pacifist appeal करते हुए देश को युद्ध की कीमत याद दिलाती रहती। और जिसके बरबक्स पाकिस्तान के establishment को ये तर्जुमा रहता कि there is no cost of spreading terrorism in India and India will not retaliate back as they fear for cost of a war with us. 


दरअसल निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है। हमें रजत शर्माओं, अर्णबों, सरदनाओं और सुधीर चौधरियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने जाने-अनजाने वैचारिक पूर्वाग्रह के बोझ से एकपक्षीय होती देश की मीडिया को बहु-पक्षीय और तदसमात निष्पक्ष बनाया। मोदी सरकार के तीन सालों में आया ये परिवर्तन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जो अपने साथ दूरगामी प्रभाव लिए आया है। 

  – अभिनव शंकर 

(ये विचार 28 मई, 21017 को लिखे गए जो इस ब्लॉग पर अब प्रकाशित हो रहे)

प्रेम का प्रेत

हम कितने ही विरोधाभासों को जीते हैं !! अब ये ही कैसा विरोधाभास है की हम अपने प्रेम को पाना चाहते हैं ?? कितने आतुर होते हैं उसे पाने के लिए?? कितने अधीर होते हैं ? ये जानते हुए भी ‘पाना’ प्रेम का ‘उत्सर्ग’ है। Climax !! उसी तरह जैसे मृत्यु जीवन का है। पर हम मरने को तो वैसी आतुरता नही दिखाते ?? उलट हम जितना हो सके उतना लंबा जीना चाहते हैं। जीने की इच्छा और प्रेम करने की इच्छा मनुज के ‘basic instinct’ के दो बड़े घटक हैं। लेकिन ‘psychological functionalism’ के नज़रिए से इन दोनों भावों के ‘behavioural execution’ में इतना अंतर कैसे आता है की एक में हम क्लाइमेक्स को जितना दूर रख सके उतना दूर रखना चाहते हैं वहीँ दूसरे में climax को हम जितना जल्द पा सके पाना चाहते हैं ??!! मुझे नही पता की किसी biopsychologist ने इस विरोधाभास पर काम किया है या नहीं। पर ठीक से देखने पर ये विरोधाभास sciences of human behaviour के सबसे रोचक पक्षो में से निश्चित ही एक होगा। मेरी दृष्टि जहाँ तक जाती है इसके पीछे का कारण शायद argue for life और argue for love के पीछे के ’emotive factor’ का अलग होना हो। ‘argue for love’ में जहाँ ये emotive factor ‘surrender’ है वहीं ‘argue for life’ में ‘fight’ । और शायद इसी कारण प्रेम में हम इतने  climax-seeking होते हैं और जीवन में उतने ही climax-phobic !! पर क्या हमें प्रेम में भी climax-phobic नही होना चाहिए ?? क्योंकि climax अंत ही तो है। चरम पर अंत !! और इसलिए एक ‘शाश्वत प्रेमी’ के लिए सबसे दुखद अपने प्रेम को पाना होता है।

 

विलक्षण ही कोई प्रेमी होता है जो ये समझ पाता है कि प्रेम को ‘पाना’ दरअसल अपने साथ एक ‘विजेता’ की ग्रंथि को लेकर आता है जो प्रेम के मूल भाव ‘समर्पण’ के विपरीत होता है। और ये विपरीत मेल अंततः प्रेम को खुरच डालता है, उसका अंत कर देता है, क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता है। एक सच्चा प्रेमी वही होता है जो प्रेम में भी climax की चाहत न करे। क्योंकि climax के बाद जो रह जाता है वो प्रेम का प्रेत होता है। अतृप्त !! और इसलिए ये अकारण नही हैं कि साहित्य और इतिहास दोनों में प्रेम की सबसे महान कहानियाँ वो हुईं जहाँ नायक-नायिका का मिलन संभव नही हो पाया, उनका एक दूसरे को पाना संभव नही हो पाया। प्रेम की सार्थकता ‘मिलन’ में नही बल्कि ‘प्रतीक्षा’ में ही है। लेकिन हम अपने ‘natural tendency’ के मारे हैं। ‘जीवित’ प्रेम को जल्द ही climax तक पहुँचा देते हैं और फिर उम्र भर उस प्रेम के ‘प्रेत’ को ढोते रहते हैं।