zender विमर्श और सेक्स

“सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है”

स्त्री-पुरुष संबंधों पर कोई भी बात सेक्स के विमर्श के बिना नही की जा सकती| क्योंकि सेक्स ही इन दोनों के बीच का अनन्यतम संबंध है। बाकी सभी संबंध इस संबंध के फलन मात्र हैं। विडंबना ये है कि अधिकतर जेंडर संबंधी विमर्श या तो सेक्स को अपने विमर्श में शामिल नही करती या शामिल करती भी है तो सेक्स को लेकर एक balanced या natural stance इस परिपेक्ष्य में सामने नही रख पाती। ज्यादातर प्रबुद्ध विचारको ने भी इस विषय पर एक रहस्यमयी चुप्पी ओढ़े रखी है। एकमात्र ओशो ही हैं जिन्होंने इस बारे में थोड़ा-बहुत बोला। उन्होंने कहा कि सेक्स से बड़ी फ़ोर्स नही है, दुनिया मे जो भी creativity है उसके मूल में सेक्स ही है। वो जीवन की अनिवार्यता है। सारी प्रकृति उस पर खड़ी है, सारा विराट सृजन उस पर खड़ा है। अगर हम इसे निंदित बना देंगे तो सारा मामला ही गड़बड़ा जाएगा। और गड़बड़ा गया है। इसलिए मनुष्य का चित्त रुग्ण से रुग्ण होता जा रहा है। ओशो सही थें कि सेक्स के प्रति निंदात्मक रवैये ने मनुष्य के चित्त को रुग्ण से रुग्णतर कर दिया। लेकिन ओशो भी इतना ही कह कर रुक गए। इससे आगे नही गए। ओशो को इससे आगे जाना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि निर्माण की एक क्रिया निषेध की अधिकारी करार दे दी गयी ?? ऐसा कैसे हुआ कि सृजन का एक यज्ञ मनुज मानस में क्रमशः धिक्कार के वेदी पर बलि चढ़ता गया ?? क्या त्रासदी हुई कि वो मनुष्य जो येन-केन प्रकारेण खुद को रचयिता कहलवा सकने को इतना लालायित रहता है उसने रचना की सबसे मौलिक क्रिया को वर्जना की हद तक छिपाने की कोशिश की ???


संभवत: ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बाकी विषयों की तरह सेक्स के doctrine पर भी शुरुवात से patriarchal सोच ने अपना कब्जा जमा लिया। जबकि सेक्स अनिवार्य रूप से एक ‘स्त्री-विषय’ है। हम माने या न माने पुरुष की भूमिका सेक्स में वस्तुतः एक ‘सेवक’ के सदृश है, जहाँ वास्तविक आनंद स्त्री के हिस्से होता है। ये अलग बात है कि पुरुष अहंकार कभी ये बात मानना नही चाहता। 


देखे तो सेक्स मूलतः प्रेम का एक ‘उपकरण’ है। एक साधन। पर इसे लेकर स्त्री और पुरुष के नज़रिए में एक fundamental अंतर है। स्त्री के लिए प्रेम सेक्स का एक inseperable अंग है। वो यहाँ उद्देश्य (प्रेम) और उपकरण(सेक्स) में भेद नही करती। वो सेक्स उसी से कर सकती है जिससे प्रेम करती है। जबकि पुरुष के लिए प्रेम और सेक्स दो अलग अलग चीजें हैं। उसके लिए प्रेम का होना सेक्स की अनिवार्य शर्त नही है। यहाँ वो उपकरण और उद्देश्य में फर्क करता है। वो उससे भी सहज ही सेक्स कर सकता है जिससे प्रेम नही करता। उपकरण को उद्देश्य से अलग कर देख सकने की ये पुरुष-प्रवृति उसे यौनिक रूप से उच्छशृंखल तो बनाती है लेकिन इस ‘उद्देश्यरहित-उपकरण’ की अपूर्णता और उसमें छिपी कपटता का भी उसे कहीं न कहीं बखूबी भान होता है। शायद यहीं से सेक्स के साथ एक किस्म के ‘अपराधबोध’ के भाव के जुड़ने की शुरुवात होती है। चूंकि सेक्स के पूरे doctrine का संचालन पुरुष वर्चस्व वाले समाज के पुरुष-सोच से हुआ, ग्लानि से भरे पुरुष के ‘alter-ego’ ने इस पूरी क्रिया को ही अनैतिक करार दे दिया, एक taboo बना दिया। शनै-शनै सेक्स के प्रति निंदात्मक भाव ने स्त्री और पुरुष दोनों के मानस में समान रूप से अपने को स्थापित कर लिया। जबकि सेक्स मूल रूप से इस दुनिया की सबसे सहज और सबसे मासूम क्रिया है। आज भी मातृसत्तात्मक समाजों में सेक्स उस किस्म का taboo नही है, बल्कि कोई टैबू ही नही है। यही कारण है कि वहाँ यौन अपराध भी न के बराबर हैं। क्योंकि स्त्री-मानसिकता से संचालित हुए सेक्स के doctrine में किसी प्रकार के अपराधबोध का भाव सम्मिलित नही था। और इसी कारण वहाँ वो अपनी स्वाभाविक गति से सहजता और परिपक्वता के साथ evolve हुआ। 


सेक्स के doctrine पर अपनी मानसिकता को हावी रखने की चेष्टा पुरुष के लिए बड़ा आत्मघाती कदम था। आज पुरुष अपनी कामुकता के लिए दुनिया भर की अदालतों के कठघरे में अपराधी के रूप में खड़ा होकर इस धृष्टता की कीमत भी अदा कर रहा है। सेक्स का taboo बन जाना स्त्री-पुरुष संबंधों के evolution की सबसे बड़ी त्रासदी है और patriarchal mentality का सबसे बड़ा दोष !!! इस त्रासदी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम ये सामने आया कि इसने स्त्री-पुरुष संबंधों को हद से अधिक जटिल कर दिया। बल्कि messy !! इस हद तक कि एक दूसरे को complement करने के लिए बनी दो identities, एक दूसरे को क्रूरता की हद तक compete कर रही हैं। आज feminism के हाहाकारी शोर और पुरुष-वर्चस्व के पाश्विक अट्टहास के बीच पड़ी ये दुनिया इस ऐतिहासिक दुर्घटना की अंतहीन शिकार है। 


– अनिकुल के कलम से

प्रेम का प्रेत

हम कितने ही विरोधाभासों को जीते हैं !! अब ये ही कैसा विरोधाभास है की हम अपने प्रेम को पाना चाहते हैं ?? कितने आतुर होते हैं उसे पाने के लिए?? कितने अधीर होते हैं ? ये जानते हुए भी ‘पाना’ प्रेम का ‘उत्सर्ग’ है। Climax !! उसी तरह जैसे मृत्यु जीवन का है। पर हम मरने को तो वैसी आतुरता नही दिखाते ?? उलट हम जितना हो सके उतना लंबा जीना चाहते हैं। जीने की इच्छा और प्रेम करने की इच्छा मनुज के ‘basic instinct’ के दो बड़े घटक हैं। लेकिन ‘psychological functionalism’ के नज़रिए से इन दोनों भावों के ‘behavioural execution’ में इतना अंतर कैसे आता है की एक में हम क्लाइमेक्स को जितना दूर रख सके उतना दूर रखना चाहते हैं वहीँ दूसरे में climax को हम जितना जल्द पा सके पाना चाहते हैं ??!! मुझे नही पता की किसी biopsychologist ने इस विरोधाभास पर काम किया है या नहीं। पर ठीक से देखने पर ये विरोधाभास sciences of human behaviour के सबसे रोचक पक्षो में से निश्चित ही एक होगा। मेरी दृष्टि जहाँ तक जाती है इसके पीछे का कारण शायद argue for life और argue for love के पीछे के ’emotive factor’ का अलग होना हो। ‘argue for love’ में जहाँ ये emotive factor ‘surrender’ है वहीं ‘argue for life’ में ‘fight’ । और शायद इसी कारण प्रेम में हम इतने  climax-seeking होते हैं और जीवन में उतने ही climax-phobic !! पर क्या हमें प्रेम में भी climax-phobic नही होना चाहिए ?? क्योंकि climax अंत ही तो है। चरम पर अंत !! और इसलिए एक ‘शाश्वत प्रेमी’ के लिए सबसे दुखद अपने प्रेम को पाना होता है।

 

विलक्षण ही कोई प्रेमी होता है जो ये समझ पाता है कि प्रेम को ‘पाना’ दरअसल अपने साथ एक ‘विजेता’ की ग्रंथि को लेकर आता है जो प्रेम के मूल भाव ‘समर्पण’ के विपरीत होता है। और ये विपरीत मेल अंततः प्रेम को खुरच डालता है, उसका अंत कर देता है, क्लाइमेक्स की तरफ ले जाता है। एक सच्चा प्रेमी वही होता है जो प्रेम में भी climax की चाहत न करे। क्योंकि climax के बाद जो रह जाता है वो प्रेम का प्रेत होता है। अतृप्त !! और इसलिए ये अकारण नही हैं कि साहित्य और इतिहास दोनों में प्रेम की सबसे महान कहानियाँ वो हुईं जहाँ नायक-नायिका का मिलन संभव नही हो पाया, उनका एक दूसरे को पाना संभव नही हो पाया। प्रेम की सार्थकता ‘मिलन’ में नही बल्कि ‘प्रतीक्षा’ में ही है। लेकिन हम अपने ‘natural tendency’ के मारे हैं। ‘जीवित’ प्रेम को जल्द ही climax तक पहुँचा देते हैं और फिर उम्र भर उस प्रेम के ‘प्रेत’ को ढोते रहते हैं।