भारतीय मीडिया: निष्पक्षीय, एकपक्षीय या बहुपक्षीय ??

निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है

आज जब मोदी सरकार के तीन साल पूरे हुए हैं तो इन तीन सालों में हुए बदलावों पर स्वाभाविक रूप से पूरे देश मे चर्चाओं का एक दौर चला है। कुछ मोदी सरकार खुद भी इन चर्चाओं को कराने को उत्सुक दिखती है। विपक्ष तो इच्छुक है ही। जाहिर है कई विषयों पर चर्चा होगी। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, रणनीतिक। मैं आज इन विषयों पर बात नही करना चाहता। नही करना चाहता इसके कई कारण है। पहला तो ये की मैं अक्सर इन क्षेत्रों में हो रहे बदलावों पर ब्लॉग वगैरह पर लिखता रहा हूँ। दूसरा, आज इन चीजों पर पहले ही टनों स्याही बहाई जा चुकी होगी और तीसरा की आज जिस विषय पर में बात करना चाहता हूं वो आज शर्तिया नही हुई होंगी या हुई भी होंगी तो उस परिपेक्ष्य में नही हुई होंगी जिस परिपेक्ष्य में होनी चाहिए। 


मोदी सरकार में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है वो मीडिया में आया हैं। रजत शर्माओं, अरनबों, सरदनाओं, सुधीर चौधरियों, गौरव सावन्तो और मारूफ रजाओं का आदुर्भाव भारतीय मीडिया के course of evolution का एक महत्वपूर्ण devlopmemt है। लोकतंत्र में आदर्श स्थिति ये होती है कि मीडिया निष्पक्ष रहता। भारत मे पत्रकारिता लगभग शुरू से वैचारिक स्तर पर एक खास ओर झुकी रही पर पिछले लगभग 12 सालों से जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का दौर आया ये ‘वैचारिक झुकाव’ शनै शनै ‘दलीय पक्षधरता’ में बदलता चला गया। और जब संघवीयों, बरखाओं, सरदेसाईओं और रविशों जैसे पत्रकारिता के सबसे बड़े नाम एक साथ एक समूह के तौर पर एक पक्ष में जा मिले तो ये स्वाभाविक हो गया था कि एक institution के तौर पर पत्रकारिता में इस ‘पक्ष’-धरता के मुकाबिल एक ‘विपक्ष’ भी उभरे। 


लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं (जिसमे press भी आता है-लोकतंत्र का चौथा स्तंभ) या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नही होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। रजत शर्मा, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, गौरव सावंत ने उस ‘एकपक्षीय’ मीडिया को ‘बहु-पक्षीय’ बनाया। मोदी सरकार के इन तीन सालों का ये सबसे बड़ा बदलाव है और एक शुभ बदलाव है। ये स्थिति भले निष्पक्ष मीडिया के utopian अवधारणा जैसी आदर्श नही है पर ‘एकपक्षीय’ मीडिया के त्रासदी से लाखों गुणा बेहतर है। 


बल्कि एक दृष्टि से बहुपक्षीय मीडिया ‘निष्पक्ष मीडिया’ के अवधारणा के काफी पास है। मिसाल के तौर पर- जब पाकिस्तान के संदर्भ में अर्णब आक्रामक तौर-तरीको की पैरवी करते हुए उसके लाभों को गिनाते हैं और बरखा pacifist appeal करते हुए युद्ध की कीमत याद दिलाती हैं; तो भले व्येक्तिक-स्तर पर वो दो विरोधी पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर मीडिया के ‘collective-conscious’ के व्यापक परिदृश्य पर वो सामूहिक तौर पर एक ‘निष्पक्ष तस्वीर’ ही सामने रखते हैं। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ये उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा बेहतर है जब इस मामले में बरखा के अकेले show में वो आदतन pacifist appeal करते हुए देश को युद्ध की कीमत याद दिलाती रहती। और जिसके बरबक्स पाकिस्तान के establishment को ये तर्जुमा रहता कि there is no cost of spreading terrorism in India and India will not retaliate back as they fear for cost of a war with us. 


दरअसल निष्पक्ष मीडिया जिस प्रकार की एक utopian अवधारणा है उसमें मीडिया को बहुपक्षीय बनाना ही निष्पक्ष मीडिया के संकल्पना का व्यवाहारिक रास्ता है। हमें रजत शर्माओं, अर्णबों, सरदनाओं और सुधीर चौधरियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने जाने-अनजाने वैचारिक पूर्वाग्रह के बोझ से एकपक्षीय होती देश की मीडिया को बहु-पक्षीय और तदसमात निष्पक्ष बनाया। मोदी सरकार के तीन सालों में आया ये परिवर्तन एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जो अपने साथ दूरगामी प्रभाव लिए आया है। 

  – अभिनव शंकर 

(ये विचार 28 मई, 21017 को लिखे गए जो इस ब्लॉग पर अब प्रकाशित हो रहे)